आयुर्वेदशास्त्र एक परिचय–
कई लोगों को आयुर्वेद शास्त्र के प्रति जिज्ञासा रहती है की आयुर्वेद क्या है? आयुर्वेद में सिर्फ जड़ी बूटियों के विषय में बताया गया है या और कुछ भी बताया गया है? इसलिए इस बार के अंक में आयुर्वेद के विषय में परिचय दिया गया है I ईमेल के माध्यम से प्रश्न पूछ सकते हैं उन प्रश्नों का समाधान आगे आने वाले लेखों में किया जाएगI
आयुर्वेद की उत्पत्ति
आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है ऋग्वेद में भी अन्य जड़ी बूटियों का वर्णन है, अतः आयुर्वेद वेदों की तरह बहुत प्राचीन शास्त्र है I आयुर्वेद का प्रथम उपदेश भगवान ब्रह्मा ने दक्ष प्रजापति को दिया था दक्ष प्रजापति ने अश्विनी कुमारों को आयुर्वेद का ज्ञान दिया तथा अश्विनी कुमारों ने भगवान इंद्र को यह ज्ञान बताया I
जब पृथ्वी पर रोग बढ़ने लगे तो हिमालय क्षेत्र में ऋषि मुनियों की एक सभा हुई ,उसमें सब्रने विचार किया कि धर्म अर्थ कIम एवं मोक्ष [चतुर्वर्ग ]की प्राप्ति का साधन तो आरोग्य ही है,रोग इस आरोग्य को नष्ट कर चतुर्वर्ग प्राप्ति में बाधा बन रहे हैं।
अतः उन सब ऋषि मुनियों ने ध्यान करना प्रारंभ किया तथा ध्यान के पश्चात यह निर्णय हुआ कि हम में से कोई एक प्रतिनिधि बनकर भगवान इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने जाएगा I
इस कार्य हेतु ऋषि भारद्वाज का चयन किया गया I इस प्रकार आयुर्वेद का पृथ्वी पर अवतरण हुआ I

आयुर्वेद की परिभाषा
आयु अर्थात जीवन, वेद का मतलब है ज्ञान I जो जीवन का ज्ञान हैं उसे ही आयुर्वेद कहते हैंI आयुर्वेद की परिभाषा देते हुए आचार्य चरक ने चरक संहिता में कहा है– चार प्रकार की आयु हैं
1.सुखायु -निरोगी काया के साथ जीवन जीने को सुख आयु कहते हैं,
2. दु:खIयु- रोग से ग्रस्त जो जीवन है वह दुख आयु कहलाता है,
3. हित आयु -समाज के लिए उपयोगी जीवन को हित आयु कहते हैं,
4. अहितआयु- समाज एवं दूसरों को दुख देने वाले जीवन को अहितआयु कहते हैं,
इन चार प्रकार की आयु के हित एवम अहित के विषय में जो शास्त्र बताता है उसे ही आयुर्वेद कहते हैं आयुर्वेद शास्त्र आयु केप्रमाण को भी बताता है I
उपरोक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि आयुर्वेद मात्र औषधि बताने वाला विज्ञान नहीं है अपितु जीवन जीने की कला है ; जो बताता हैकि स्वयं स्वस्थ कैसे रहें तथा समाज में रहते हुए किस तरह समाज के लिए उपयोगी जीवन जिए I
आयुर्वेद के उद्देश्य
आयुर्वेद के दो ही उद्देश्य है
- स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना I
- रोगी व्यक्ति का उपचार करना I
1] प्रथम उद्देश्य की पूर्ति के लिए आयुर्वेद में आहार, दिनचर्या ,ऋतु चर्या ,अग्नि, दोष ,प्रकृति ,प्रकृति अनुसार भोजन ,रसायन आदि का विस्तृत वर्णन दिया गया है I
हम अब तक आहार एवं दिनचर्या, ,ऋतु चर्या [हर अंक में एक ऋतु] का वर्णन किया है Iदोष प्रकृति अग्नि आदि का वर्णन भी हम अगले कुछ अंकों में प्रस्तुत करेंगे I
2] आयुर्वेद का दूसरा उद्देश्य है रोगी का उपचार करना, आयुर्वेद में रोगों के उपचार के लिए मुख्यतः जड़ी बूटियों का ही प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता है I
आयुर्वेद में कुछ दवाइयां जो धातु एवं पारद आदि के प्रयोग से रसशास्त्र शाखा में बनाई जाती है, इस हेतु धातुओं को औषधि के रूप में परिवर्तित करने के लिए कई माह तक जड़ी बूटियों के स्वरस में भिगोकर खरल में घुट-घुट कर इतना हल्का बना दिया जाता है कि घुट कर वे धातु औषधि में परिवर्तित हो जाती है I

आयुर्वेद संबंधित संशय का निवारण
आयुर्वेद में मात्रा का बहुत महत्व है चरक संहिता में कहा गया है कि आहार भी यदि मात्रा से अधिक लिया जाए तो विष बन जाता है और विष भी यदि सही मात्रा में लिया जाए तो औषधि का कIम कर सकता है I
इसलिए आयुर्वेद की दवाइयां आयुर्वेद चिकित्सक के निर्देशानुसार कही गई मात्रा में ही लेना चाहिए I
अक्सर लोग कहते हैं कि आयुर्वेद की दवाइयां देर से कIम करती है ऐसा क्यों ? मेरा उन लोगों से यही कहना है कि आयुर्वेद की दवाइयां रोग की जड़ पर कIम करती है अतः उसे समय ज्यादा लगता है इसे समझने के लिए एक उदाहरण देंगे कि-
यदि आपके घर की दीवारों को कमजोर हो जाए , गंदी हो जाएं तो कोई व्यक्ति कहे कि वह 2 दिन में पेंट करके देगा और पैसा भी कम लेगा लेकिन दूसरा व्यक्ति कहे कि वह आपके घर की दीवारों को को 4 दिन में पेंट कर पाएगा क्योंकि वह पहले दीवारों में पुट्टी भरेगा ताकि दीवारों में होने वाले गड्ढे और गिरे हुए प्रस्तर को ठीक किया जा सके उसके बाद ही वह पेंट करेगा पर दीवारें मजबूत हो जाएगी भले ही पैसा थोड़ा ज्यादा लगेगा I तो आप किस पेंटर को चुनोगे ?
शरीर भी आपकी आत्मा का घर है गलत आहार-विहार दिनचर्या एवं उम्र के साथ इसकी दीवारों में भी कमजोरी आती है आयुर्वेद की दवाइयां पहले आप के दोष वात पित्त कफ के असंतुलन को ठीक करती है फिर रोग की जड़ पर कIम करती और शरीर को लंबे समय तक मजबूत रखती है I
अतः निर्णय आपको करना है कि आप 2 दिन में ठीक होना चाहते हैं या रोग की जड़ को ठीक करते हुए तीन चार दिन में I हां समय की समस्या है आज कल हर व्यक्ति दौड़ भाग में लगा रहता है किंतु स्वास्थ्य से बढ़कर कोई चीज कैसे हो सकती है?
एक बार आपका स्वास्थ्य खराब हो गया तो आप कितना भी पैसा कमा चुके हो पर वह स्वास्थ दोबारा नहीं प्राप्त कर सकते हैं।
वैसे कई बीमारियां ऐसी है जैसे गठिया ,डायबिटीज़, ब्लडप्रेशर ,मानसिक रोग ,अनिद्रा, तनाव, त्वचा रोग आदि का एलोपैथी में भी इलाज कई महीने चलता है या जीवन भर चलता है परंतु गारंटी वह लोग भी नहीं दे पाते हैं I
जबकि इन बीमारियों में यदि आप आयुर्वेद की दवाइयां खाएं तो लंबे समय तक दवाइयां चलेगी पर कम साइड इफेक्ट होगा I
आयुर्वेद शरीर के मन एवं आत्मा को एकीकृत करके इलाज के विषय में सोचता है हमारे सारे अंग एक दूसरे के साथ समन्वय करके शरीर के स्वास्थ्य को बनाए रखते हैं I
इसीलिए आयुर्वेद में पूरे शरीर के दोषों का संतुलन देखकर ही चिकित्सा की जाती है I
एक योग्य आयुर्वेद चिकित्सक पहले आपकी नाड़ी परीक्षा करता है फिर औषधि लिखता है Iआयुर्वेद की नाडी परीक्षा सिर्फ नाड़ी की गति को देखना नहीं है यह एक गहरा विज्ञान है जो गुरु शिष्य परंपरा से अब तक जीवित है, नाड़ी परीक्षा से दोषो के संतुलन तथा रोग की गंभीरता आदि का पता चल जाता है I
आयुर्वेद शास्त्र की अन्य विशेषताएं
आयुर्वेद शास्त्र एक शाश्वत विज्ञान है अर्थात वह हमेशा हर काल में एक जैसा रहता है, यही वजह है कि जागरूक लोग अब आयुर्वेद योग आदि चिकित्सा पद्धतियों को अपना रहे हैंI
आयुर्वेद की एक और मुख्य विशेषता है कि वह हर व्यक्ति को अपने आप में अलग मानता है हर व्यक्ति की आयुर्वेद के अनुसार प्रकृति जन्म से ही तय हो जाती है जैसे आपका फिंगरप्रिंट अलग होता है वैसे आपकी प्रकृति भी और लोगों से अलग होती है I
आपकी प्रकृति के आधार पर ही आपको दवाई आहार-विहार आदि के विषय में आयुर्वेद चिकित्सक बताता है एक ही रोग के यदि दो व्यक्ति आ जाएं तो दोनों व्यक्ति की प्रकृति के आधार पर आयुर्वेद की औषधि अलग अलग होती है I
आयुर्वेद की एक और विशेषता है उसकी शोधन चिकित्सा शोधन अथार्थ शुद्धि करना आयुर्वेद में दवाइयों के माध्यम से दोषों को सिर्फ दबाया ही नहीं जाता बल्कि ऐसी दवाइयां दी जाती है जो आपके दोषों को पूरी तरह शरीर से निकालकर के बाहर कर देती है ,शोधन चिकित्सा को आयुर्वेद में पंचकर्म चिकित्सा भी कहा जाता हैI
अतः यह स्पष्ट है कि आयुर्वेद सिर्फ एक चिकित्सा विज्ञान नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की कला है जिसमें रोगों को सिर्फ शरीर के ऊपर ही नहीं माना जाता है बल्कि रोगों के पीछे छिपे मानसिक एवं आध्यात्मिक कारणों को भी देखा जाता है I
आयुर्वेद चेतना से स्वास्थ्य प्राप्त करने का ज्ञान देता है ना कि सिर्फ दवाइयों से स्वास्थ देता है I आयुर्वेद शरीर के स्वास्थ्य के साथ-साथ हमारे समाज में तथा परिवार में व्यव्हार के ऊपर भी बहुत सी जानकारियां देता है जिन्हें आचार रसायन एवं सदवृत्त के नाम से आयुर्वेद के संहिताओं में वर्णन किया गया है I

